آهو نمی‌شوی بدین جست‌وخیز، گوسِپند




Friday, January 20, 2006

هيچوقت نمي داني از کجا شروع مي شود. هيچوقت نمي داني چرا يا چگونه شروع مي شود. وقتي سرگشتگي ها شروع مي شوند مي ايستي و برمي گردي و به عقب نگاه مي کني و از خودت مي پرسي: «چي شد؟» و مي گردي دنبال دليل ... که پيدايش هم نمي کني. کدام باد دانه ي اين حس کشنده را که تو را با خودش به انتهاي خودت ميکشاند با خودش آورده است؟ نخواهي دانست. چرا اين چهره ... چرا اين تن ... چرا اين لبخند؟ نخواهي دانست. مي بردت. هيچ وقت نمي داني که همه چيز کي از اختيارت خارج شده است. اما همين است که دوست مي داري نه؟ همين بي اختياري را.

مي داني ... من هميشه فکر کردم که نبايد به آخر خط نگاه کرد. نبايد دربند نتيجه بود. نبايد چيزها را عوض کرد. بايد خواست، دل داد و پذيرفت. به من گفت: «من يکروزي مي روم. تو خواهي ماند». شانه بالا انداختم: «مگر در اين دنيا چيزي مي آيد که بماند؟ مگر من ماندني هستم که تو نخواهي بود؟» با هم مانديم تا آن روزي بيايد که بتوانيم با هم نمانيم. آن روز رسيد. رفت. رفتم. وانهادگي شايد انتخاب ما نيست اما اين انتخاب ماست که بمانيم يا برويم. رفتيم.
زمانش که رسيد برو. زمانش که رسيد.

مي دانم که نمي داني از کجا شروع مي شود يا چرا شروع مي شود ... تنها مي داني که مي خواهي. که رنج مي بري. هيچ فکر کرده اي که اين انتخاب تو به تنهايي نيست؟ که اين تو نيستي که چيزي را مي خواهي که رنجت مي دهد چون ماندني نيست و ماندني نيست چون رنجت مي دهد ...که ديگري هم هست که رنج مي کشد از ماندن و رنج مي کشد از رفتن و رنجت مي دهد و رنجش مي دهي؟ که هر دو از رنج خود و از رنج ديگري رنج مي بريد و حواستان از آن تغذيه مي کند و غني مي شود؟
مي گويد که مي رود. مي داند که مي رود. خواهد رفت. بايد برود.

هيچوقت نمي داني چرا يکجايي نمي ايستي و نمي گويي:‌«نه!» چرا نمي گويي:‌«من ديگر مي روم؟» يا توان آنرا نداري که بگويي: «بمان.» هيچوقت نمي داني چرا بايد بروي. ديگران برايت مهملات به هم مي بافند و از دادن و گرفتن و توازن و تعادل حرف مي زنند اما تو کجا و تعادل کجا ... شانه بالا مي اندازي: «با اين تنگ بيني هايتان!» اما خودت هم مي داني که جايي جلوتر، سر اين پيچ يا آن پيچ چيزها از حرکت خواهند ايستاد و در هم خواهد ريخت و رفتني خواهد رفت و ماندني خواهد ماند. مسخره است اما هيچوقت نمي داني بايدها از کجا مي آيند.

جوانتر که بودم -در بيست و سه سالگي- فکر مي کردم که آدمها خودشان را در يکجايي تعريف کرده اند ... آنطور که خواهند بود. و هيچ چيز و هيچ کس توانايي آنرا ندارد که آنها را از تعريفشان جدا کند. و اگر در راهشان به اتفاق به تو برمي خورند که تعريفشان را از خودشان بر هم مي زني و قاطي پاطي شان مي کني تو را دوست مي گيرند و تو را دوست مي دارند اما مي دانند که باز خواهند گشت به همان که خواسته اند باشند و فکر مي کنند بايد باشند. جوانتر که بودم به اين نتيجه رسيدم که بايد از همين فرصت استفاده کرد و دوستشان داشت و رفتنشان را - بازگشتشان را- پذيرفت. همين.

سختگير نبايد بود. تا هست مي ماني ... آنگاه که رفت مي روي. اينهم سهم توست. فقط اگر بتواني بپذيري ... فقط اگر بتواني.

"ليلای ليلی"


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