آهو نمی‌شوی بدین جست‌وخیز، گوسِپند




Thursday, May 21, 2009

آدم‌ها بايد بلد باشند وقتی کسی بهشان می‌گويد بايد بروم، يعنی بايد برود..
اوهوم..


بعد خوب اين‌جوری‌ست که بعضی بعدازظهرها خانه برق می‌زند و يک‌جورِ خوبی خنک و خلوت و دل‌چسب است.. انگار يک نصفه طالبی را با رنده‌ی ريز دسته قرمز رنديده باشی‌ش توی ليوان بزرگِ آبجوخوری، يک‌جوری که آب سبز ملايمش معلق مانده باشد ميان کيوب‌های کوچک يخ و قاشق نقره‌ایِ باريک و بلند.. بعد بفهمی‌نفهمی بوی عرق شاه‌نسترن هم هرازگاهی بپيچد توی هوا.. رگه‌ی آفتاب دمِ عصر هم ردش افتاده باشد روی فرش خشتیِ چارگوش کف زمين.. بعد همان‌جور که خودت را رها کرده‌ای توی قصه‌ی کتاب و داری با انگشتت قطعه‌های يخ را هل می‌دهی پايين، موبايلت سوت‌زنان صفحه‌اش را به رخ بکشد که هوی، من هستم هنوزها.. بعد همان‌جور که با دست چپ گوشه‌ی بالای صفحه‌ی شصت‌ونه را نگه داشته‌ای، همان‌جور که دست راستت دارد برای خودش يخ‌های کوچک سربه‌هوا را هل می‌دهد پايين، آن‌قدر اسمش را تماشا کنی تا خسته شود سوت زدن از سرش بيفتد.. بعد با خودت فکر کنی چه‌ دلم حرف نزدن می‌خواهد با آدم پشت آن شماره آدمِ پشت آن اسم.. با خودت فکر کنی چه حس سبُکِ خوبِ قابل احترامی.. چه روراست شده‌ام با زنِ ملاحظه‌کاری که توی من است.. بعد با خودت فکر کنی چه دلم جاکن شدن می‌خواهد دوباره، ازين‌جا، ازين اسم‌ها، ازين شماره‌ها، ازين کلمه‌ها.. بعد..

بعد يادِ حرف تو می‌افتم.. برايم از دل‌نگرانی‌هايت نوشته بودی.. از «حزنِ پریشانِ نیامده‌های کاش‌هیچ‌وقت‌نیاید».. از «کوره‌راه‌هایی که سر یک پیچِ ناغافل، من جا بمانم و تو راهت را بکشی و بروی».. از «بس که آدمِ ماندن ندیدم تو را».. بعد با خودم فکر می‌کنم اوهوم.. راست می‌گويی انگار.. هميشه وقتی رسيده که ديگر آدمِ ماندن نبوده‌ام.. که سبُک شده‌ام آرام مانده‌ام ازين نماندن، ازين رفتن‌ام..

اما حالا وسط همين رخوتِ دل‌چسبِ بعدازظهر بهاریِ آخر هفته، اين را برايت يادداشت می‌گذارم اين‌جا، که يادت باشد يک وقتی يک روزی شبی توی يکی از همان وقت‌های سرِ فرصت‌مان، که نشسته‌ام توی بغلت دست‌هايت پيچيده دورم دنيا امن و امان است در آغوشت، ازم بپرسی برايت بگويم چی شد چه‌جوری‌ می‌شود آرام و روراست و سبُک خودت را ببينی که داری می‌روی، که رفته‌ای.. که يعنی هميشه هم اين‌جوری نبوده اين‌جوری نيست که من آدمِ هميشه‌نماندن باشم، نه.. آدم‌ها هم زيادآدمِ نگه‌داشتن نيستند.. آدم‌ها دل‌شان می‌خواهد به جای تورابرای‌خودشان‌نگه‌داشتن، تو را برای‌ خودشان داشته باشند.. بعد اين‌جوری می‌شود که رشته‌ی نگه‌داشته‌گی‌ها گره می‌خورد به داشته‌ها و ناداشته‌ها و الخ، بعد يک‌هو می‌بينی ديگر چيزی نيست چيزی نمانده برای نگاه‌داشتن‌ات.. بعد می‌شوی آدمِ نماندن، آدمِ رفتن..

اوهوم.. يادم بينداز يک وقتی يواشکی زير گوشت بگويم چه‌کار کنی برای نگه‌داشتن‌ام.. نرفتن‌ام.. که بگويم می‌مانم، نمی‌روم‌ات..


Comments:
پس اصرار چی؟
من نمیخوام بره چی؟
نمیشه یعنی؟
من میخواستم برم ، نمزاره ، چه کنم؟
با تشکر
 
Post a Comment

Archive:
February 2002  March 2002  April 2002  May 2002  June 2002  July 2002  August 2002  September 2002  October 2002  November 2002  December 2002  January 2003  February 2003  March 2003  April 2003  May 2003  June 2003  July 2003  August 2003  September 2003  October 2003  November 2003  December 2003  January 2004  February 2004  March 2004  April 2004  May 2004  June 2004  July 2004  August 2004  September 2004  October 2004  November 2004  December 2004  January 2005  February 2005  March 2005  April 2005  May 2005  June 2005  July 2005  August 2005  September 2005  October 2005  November 2005  December 2005  January 2006  February 2006  March 2006  April 2006  May 2006  June 2006  July 2006  August 2006  September 2006  October 2006  November 2006  December 2006  January 2007  February 2007  March 2007  April 2007  May 2007  June 2007  July 2007  August 2007  September 2007  October 2007  November 2007  December 2007  January 2008  February 2008  March 2008  April 2008  May 2008  June 2008  July 2008  August 2008  September 2008  October 2008  November 2008  December 2008  January 2009  February 2009  March 2009  April 2009  May 2009  June 2009  July 2009  August 2009  September 2009  October 2009  November 2009  December 2009  January 2010  February 2010  March 2010  April 2010  May 2010  June 2010  July 2010  August 2010  September 2010  October 2010  November 2010  December 2010  January 2011  February 2011  March 2011  April 2011  May 2011  June 2011  July 2011  August 2011  September 2011  October 2011  November 2011  December 2011  January 2012  February 2012  March 2012  April 2012  May 2012  June 2012  July 2012  August 2012  September 2012  October 2012  November 2012  December 2012  January 2013  February 2013  March 2013  April 2013  May 2013  June 2013  July 2013  August 2013  September 2013  October 2013  November 2013  December 2013  January 2014  February 2014  March 2014  April 2014  May 2014  June 2014  July 2014  August 2014  September 2014  October 2014  November 2014  December 2014  January 2015  February 2015  March 2015  April 2015  May 2015  June 2015  July 2015  August 2015  September 2015  October 2015  November 2015  December 2015  January 2016  February 2016  March 2016  April 2016  May 2016  June 2016  July 2016  August 2016  September 2016  October 2016  November 2016  December 2016  January 2017  February 2017  March 2017  April 2017  May 2017  June 2017  July 2017  August 2017  September 2017  October 2017  November 2017  December 2017  January 2018  February 2018  March 2018  April 2018  May 2018  June 2018  July 2018  August 2018  September 2018  October 2018  November 2018  December 2018  January 2019  February 2019  March 2019  April 2019  May 2019  June 2019  July 2019  August 2019  September 2019  October 2019  November 2019  December 2019  February 2020  March 2020  April 2020  May 2020  June 2020  July 2020  August 2020  September 2020  October 2020  November 2020  December 2020  January 2021  February 2021  March 2021  April 2021  May 2021  June 2021  July 2021  August 2021  September 2021  October 2021  November 2021  December 2021  January 2022  February 2022  March 2022  April 2022  May 2022  July 2022  August 2022  September 2022  June 2024  July 2024  August 2024  October 2024  May 2025  August 2025  September 2025  October 2025  November 2025  December 2025